Wednesday, December 20, 2017

Learnings from Recent State Elections in India

December 18, 2017 marked another milestone in Indian political scenario with Himachal and Gujarat wins recorded by the Right wing party - Bhartiya Janta Party (BJP).  It was very interesting scene to the final results that all the major politicians as well as media houses had their priorities set for Gujarat; why not it is the home state for the current Prime Minister Narendra Modi and the BJP Party president. For them a lot was at stake, but why the Indian National Congress (INC or Congress) was training its guns for the Gujarat Elections rather than additionally focusing on Himachal? Straight forward reason, if they would have won Gujarat elections, that would have given them a much needed boost and momentum to look forward for the general elections in 2019.  

By far we saw a lot of dramatics from both the BJP and the INC where they went overboard to woo the voters and still both of them failed miserably.  BJP faced much worse a failure than what INC failed as if we look back at the results, INC gained additional seat from what they had in 2012 and also gained ample vote share crossing 40% mark.  But INC did fail to make a mark with the voters even though they tried to ride the "Hindutva" sentiments.

There is a lot of learning from the so called success as well as failure of both the parties in Gujarat and they can be listed as - 
  1. Complacency never helps garner support as if you grow complacent, you tend to become arrogant and this is what BJP leaders need to learn from the Gujarat Elections
  2. Never divert your attention from where you have been strong, ensure that sufficient balance is maintained between you strong and weak foot.  INC leaders need to learn this from their losses in Himachal and Gujarat.  They should not have solely focused on Gujarat and neglect Himachal.
  3. Caste based division may help you garner additional votes, but they wouldn't help you actually win. INC needs to learn this as the face of Young Indians is not caste, they  prefer development and that should be the main focus to ensure that a right message goes to the voters
  4. Portraying yourself that you are not will only create confusion and there are way many more than you can actually think to expose your truth. INC must learn this from Gujarat results.  Rahul Gandhi can't portray as a Hindu when he was said to be Baptized in Italy and had a catholic upbringing. Jut putting on Janeu (Sacred Thread) doesn't mark you as Hindu or Brahmin, you need to showcase that in your behavior and the life that you lead
  5. Transparency is very important and no amount of sops would help you garner the support that you need if you don't maintain transparency. The voters now are way more informed than in past with electronic media reaching in the reach of their palm.  It is important that any policy and procedure should be well drafted and communicated to ensure that masses understand it the way it should be and don't get influenced by any skewed version
  6. When you walk out there, walk out with polite attitude and not sugar coated or arrogant.  People have shed that process off where they used to look at party symbol or a single candidate. Now they vote on merit
  7. For local elections, please ensure that local issues are discussed rather than trying to cross pollinate with other states or the national level. demographic and other differences have a big impact on perception of schemes of development across the nation v/s a specific state
The learning is equal for both INC and BJP. 

I suppose that the BJP brass would have got that subtle zig "Jor ka jhatka dhire se lage", that was much needed to hit their arrogance and complacency that they developed after winning at the center and then in Uttar Pradesh.  They should have played better and they should from here play better to improve their vote share.

On the contrary, INC needs to focus on what actually worked in their favor in Gujarat in particular, certainly not the Hindutva agenda nor the Hardik Patel effect.  They should also look at the aspect where they lost in Himachal and the main reason they could win a few seats there.  

Both the parties need to focus on their wins and losses o be able to prepare for the general elections in 2019. They both would be getting a few chances midway to test their strategies and ensure that they carry their learning forward to turn the tables during 2019 general elections.

One thing for sure, INC would give a tough fight to BJP, if BJP wouldn't take learnings from their loss in Gujarat Election and it may actually result in a hung parliament with coalition government at the center!!

Tuesday, September 5, 2017

India @ 70 - Part 2

Since this part is more about the political scenario in India, I will post most parts in Hindi. To start with, I will state a story that I received in a chat group and will follow with some pointers from there-on.

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये; हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा ! भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे ! रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था। वह जोर से चिल्लाने लगा।

हंसिनी ने हंस से कहा- "अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते!! ये उल्लू चिल्ला रहा है।

हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ?? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।

पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।

सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।

हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।

हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ?? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!

उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंचलोग भी आ गये! बोले- भाई किस बात का विवाद है ??

लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!

लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!

रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!

हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ?? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?

उल्लू ने कहा - नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!

लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।

यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!
----

अब यदि यह कहानी पढ़कर आप सोच रहे हैं कि हमारे राष्ट्र की भी यही हालत है, तो आप सही हैं। विगत ७० वर्षों में हमारे राष्ट्र में हमने भी यही सब किया है।  जात पात के आधार पर, धर्मांधता के आधार पर एवं भाषा के आधार पर हमें बाँटने वाले तथाकथित बुदधिजिवीयोन को हमने अपना नेता चुना एवं राष्ट्र की सत्ता उनके हाथ में सोंप दी। विगत ७० वर्षों में हमने एक बार भी नहीं सोचा की इस राष्ट्र में सामाजिक अराजकता, हिंसा, अपराध, भ्रष्टाचार आदि को बढ़ावा यही तथाकथित बुद्धिजीवी देते आए हैं।  आप और मैं यह सोच कर की हमारे कुछ करने से क्या होगा, ७० वर्षों तक सोते रहे और एक बार भी राष्ट्र के बारे में नहीं सोचा।  

आज वही बुद्धिजीवी राष्ट्र के सैनिकों का अपमान करते है, पड़ोसी राष्ट्र में जा कर अपने राष्ट्र का अपमान करते हैं एवं अपने ही राष्ट्र में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं।  हम आज भी सो रहे हैं, एवं उन्हें अनुकरणीय समझ रहे हैं, या हम ७० वर्ष के इस राष्ट्र की राष्ट्रीय धरोहर को ही खो रहे हैं?

स्वतंत्रता के ७० वर्ष बाद भी हम स्वतंत्र नहीं हैं, हमारी सोच स्वतंत्र नहीं है। हम आज भी सामाजिक अराजकता के अधीन इस राष्ट्र को पंगु बनाने में लीं हैं।

यदि आज हमें कुछ करने की आवश्यकता है तो सर्वप्रथम अपने विचारों को स्वतंत्र कर राष्ट्र निर्माण में सहयोग करने की, ना की किसी युवराज अथवा किसी भांड के पीछे चल स्वयं को स्वतंत्र कहने की।