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Thursday, August 4, 2011

कुछ शायराना अंदाज़ - ३

हसीन  साथ हो और गर शायरी कि बात हो तो रात कुछ इस कदर गुजरती है -

उनके शब्द------
इरादों की कोई सीमा नहीं होती...
इश्क़ की कोई तहजीब नहीं होती...
बस हम कदम बन के चले संग कोई...
तो कोई मंजिल कठिन नहीं होती...


 
हमारा  जवाब.....
तहजीब न हो गर इश्क की तो उसे वासना कहते हैं
इरादों कि गर सीमा ना हो तो इंसान को सरफिरा कहते हैं
तदबीर कुछ ऐसी है जहाँ के बाशिंदों की
क्या कहूँ कुछ दर्द उभर आता है सीने में
 
कठिन मंजीलें नहीं राहे मंजिल हुआ करती है
कि राह से बढ़कर कठिन राहे तन्हाई हुआ करती है
हम कदम हम राह बहुत मिल जाएंगे जहाँ में
हमसफ़र कम राहगुजर बहुत मिल जाएंगे इस जहाँ में


उनका  ख्याल.....
हर्फ़-ऐ-अश्क ग़र हम रोज़ लिखा करते...
तो अब तक पैमाना-ऐ-ग़ज़ल बन गई होती...
काश आपके आगोश में होता कुछ ऐसा नशा...
के जुस्तजू हमारी हकीकत बन गई होती...
आशिक़-ऐ-दिल की जुबां से ग़र अर्ज़ किया करते...
ख्वाबों की ताबीर ख़ुद-ब-ख़ुद हो गई होती...

हमारा ख्याल......
ग़ज़लों का पैमाना तो हम बहुत पी चुके
साकी के हाथों जाम बहुत पी चुके
आज बैठे हैं हम अश्कों का जाम पीते
गर इन्हें तेरे होंठ पीते तो क्या पीते
आगोश में मेरे जो तेरी जुल्फें रुक गयीं हैं
उनकी जुबानी अरज करते तो क्या करते
आलम-ऐ-हकीकत कुछ इस कदर है कातिल
कि आशिके-ऐ-दिल कि मय्यत सजी है

रिश्तों  पर उनकी सोच....
कुछ रिश्तों की गहराईयों को हम समझ न पाए हैं...
इस कदर डूबे की कभी उबर ही नहीं पाए हैं…
चाहत तो बहुत कुछ कहने की थी...
क्या कहें इस कोशिश में ऐसे खोए...
ना ही डूब पाए ना उबर ही पाए

रिश्तों  पर कुछ हमारी सोच.....
रिश्तों से गहरी तो सोच है तुम्हारी
कि रिश्तों कि डोर से बंधी उम्र है तुम्हारी
लरजते कांपते लबों पर थिरके जो शब्द
अश्कों की माला में पीरो दिए तुमने
मझधार में खड़े हो कर ऐ साहिल
गिला क्यूँ करते हो किनारे की दूरी का

कुछ शायराना अंदाज़ - २

कुछ नायाब शायराना गुफ्तगू यूँ हुई, कि हम उसे आपसे दूर रख ना सके.....

हमने लिखा -
दिल को सम्हाल के रखना इस कदर
कि टूटे ना वो हमारी इस कलम पर
शीशा नहीं है ना है वो खिलौना
अरे तेरा दिल है नहीं मिटटी का घरौंदा


 उन्होंने कहा - 
बेहाली का आपकी सबब क्या है... 
यह हम नहीं जानते... 
गौर सिर्फ़ इतना करना की ... 
कहीं कोई बेख़याली ना हो जाए  

हमने उनसे इल्तजा की - 
बेहाली बेखयाली बने तो क्या गम है
बेसब्र बेध्यानी बने तो क्या गम है
समझ तू इतना लीजे ये कातिल
कि तेरी बेरुखी मेरी बेहयाई न बन जाए

कुछ शायराना अंदाज़

एक  हसीन दोस्त कि कुछ नायाब पेशकश कुछ इस क़द्र थी -

दर्द क्या होता है बताएँगे किसी रोज़,
कमाल की एक ग़ज़ल सुनायेंगे किसी रोज़,
उड़ने दो इन परिंदों को आज़ाद फिज़ाओ में,
हमारे हुए तो लौट के आएंगे किसी रोज़....
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उसपर हमारी कलम से निकले शब्द कुछ इस क़द्र हैं -


सिर्फ आपकी चंद पंक्तियों ने कुछ ऐसा वार किया,
कि दिल से आह ना निकली कलम ने शब्द बिखेर दिए

दर्द का गर अहसास ऐसा है तो उसे छुपाते क्यूँ हो
अपने गम को अपनी मुस्कराहट से दबाते क्यूँ हो
गर नगमें इतने ग़मगीन हैं तो गुनगुनाते क्यूँ हो
ऐ हसीन, खुदा से इतने नाराज़ हो तो इबादत करते क्यूँ हो
परिंदों को फिजाओं में गर उड़ाते देखने का शौक है
तो ऐ बंदे उन्हें अपना बना पिंजरे में कैद करते क्यों हो

कभी किसी कि आह कि आग से ना खेलना कातिल
कि आग से ना जले तो क्या आह तुम्हे ले डूबेगी

Wednesday, July 27, 2011

जिंदगी

गुनगुनाती सी कुछ यूँ आई मेरे सपनो में
उसकी वो चहल कर गई घर इस दिल में
सोचते हैं कि गर वो चली गयी जिंदगी से
किन मायूस लम्हों से गुज़रेगी बेराग जिंदगी

कि उसके ख्वाबों खयालों में खेली ये जिंदगी
बिन उसके बीते यूँ इसके उदास पल राहे तन्हाई में
तकल्लुफ बड़े उठाये यूँ बेपनाह मोहब्बत कर
कि हमें सिला कुछ ऐसा मिला तन्हा जिंदगी में

दर्द-ऐ-दिल को मिले हैं लफ्जात आज इस कदर
न रोको इन्हें कि बेज़ुबां न फिर कभी कह सकेगा
रुक सी गयी है काएनात आज कुछ इस कदर
सोच कर कि कब तेरा दीदार नसीब होगा

कि उसके ख्वाबों खयालों में खेली ये जिंदगी
किन मायूस लम्हों से गुज़रेगी बेराग जिंदगी
कि हमें सिला कुछ ऐसा मिला तन्हा जिंदगी में
सोच कर कि कब तेरा दीदार नसीब होगा

Sunday, June 19, 2011

आलम-ऐ-मोहब्बत

आँखों के नशेमन से से जाम पिलाना चाहते हो
होठों से अपने जो पैगाम देना चाहते हो
दुनिया से बचाकर जो जुल्फों में घेरना चाहते हो
आज हिज्र के आलम में ये रुख किये जाते हो

बेसब्र क्यूँ हो इतना तन्हाई के डर से
क्यूँ थम जाते हैं कदम तुम्हारे खुदा के दर पे
क्या है जो यूँ इल्तेजा बेहिसाब किये जाते हो
ना चाहते हुए भी उनको रुसवा किये जाते हो
क्या दिल में कोई दर्द बसर करता है
क्या लफ्जों को हया का पर्दा कसता है
क्यों बयां नहीं करते हाल-ऐ-दिल का
ये दिल तो उन्ही से मोहब्बत करता है

Thursday, June 16, 2011

नज़र

नज़र ना झुका कि इनमें मेरा अक्स नज़र आता है
कि नज़र ना चुरा इनमें मेरा इश्क नज़र आता है
यूँ बेदर्द ना बन कि तेरी जुदाई मार ना डाले
कि जुदाई के दर्द में सिरहन उभर आती है



Monday, June 6, 2011

नासूर

आज वो गुज़ारा ज़माना याद आता है
हर एक बिता पल याद आता है
जिंदगी ने दिया जो ज़ख्म
वो नासूर बन उभर आता है
क्या खता थी मेरी ऐ खुदा
कि मने जिंदगी से ये सिला पाया है
ना कोई रंज न कोई गिला कर सकते हैं
कि दिल-ऐ-नासूर इतना गहरा पाया है

Wednesday, June 1, 2011

तलाश-ऐ-अक्स

ज़िन्दगी में अपना अक्स खोजता हूँ
रात--सहर आइना देखता हूँ
वक्त का दरिया है की थमता नहीं
उम्र का आँचल है की रुकता नहीं

सोचता हूँ यूँही अक्सर
सुलझाता नहीं क्यों ये भंवर
मझधार में ना जाने क्यूँ
तलाशता हूँ मैं हमसफ़र

ज़िन्दगी में ना जाने क्यूँ
खत्म सी नहीं होती तलाश
कि मौत कि और बढते हुए
खोजता हूँ ज़िन्दगी के माने

इल्तेजा

शाम--गम को रंगीन करके ख्वाबों में तेरे खोए रहते हैं
गर भूले से आओ सामने तुम तो ख्वाब समझ कर सोये रहते हैं
जुल्फों के साए में छुपा लो तुम कि जिंदगी से रुसवा हुए जाते हैं
यादों में बसा लो आज हमें कि बाँहों में बेदम हुए जाते हैं
रुख ना मोडो इस कदर बेरूख होकर ऐ जान-ऐ-वफ़ा
कि तेरे जाने से जिंदगी बेजार हुए जाती है

Monday, May 30, 2011

पथ्थर

टूटना तो आइने की किस्मत है
आपकी खूबसूरती कि ये एक खिदमत है
सोचता हूँ इस मोड पर आकर
क्यूँ ना आपसे ये सवाल करूँ
कि कहीं किसी मुकाम पर
क्या कभी किसी पथ्थर को तराशा है
यूँ देखिये कि शीशे की मूरत नहीं बनती
पथ्थर तराश इंसान इबादत करते हैं

Thursday, May 26, 2011

मोहब्बत का परवाना


हमने दो लफ्ज क्या कहे इश्क पर
कि दुनिया ने हमें यूँ सुनाया
न हम सोच सके कि क्या है खता हमारी
कि काँटों से हमारी सेज को सजाया
ना जानते थे कि वो लफ्ज हमारे
करेंगे हमें इस कदर रुसवा
कि बेआबरू कर हमें
यूँ जार जार करेगी दुनिया
कैसे कहें उनसे हम अपनी कहानी
कैसे बयां करें हाल-ऐ-जिंदगानी
क्या कहें कि क्या दर्द है इस दिल में
कि कैसे नासूर है दबे इस दिल में
कैसे हमनें संभाला है इस बेजुबान को
जब इसनें इश्क का कलमा पढ़ा
कैसे उबारा हमनें इस दिल को
जब इसनें मोहब्बत के दरिया में डूबना चाहा
कैसे थामा हमनें इस दिल को
जब इसनें प्यार का इकरार किया
कैसे सवानरी है हमनें ये जिंदगी
जब इस जिंदगी नें हमें खाकसार किया
ना समझों हमें इश्क की गलियों में नादाँ
कि हमारे ही आंसुओं ने इस गली को आबाद किया
कि हमारे दिल ने डूब दरिया में गहराई को नापा है
कि हमारे दिल ने दर्द के समंदर का तूफ़ान देखा है
खुशी तो इसनें छोड़ दी थी दोस्त की चाहत में
रांझे से ज्यादा इसनें इस जमीन पे प्यार फेंका है
फिर भी ये दिल न पागल हुआ न दीवाना
ये तो बना मोहब्बत कि शमा पर कुर्बान एक परवाना

Sunday, May 22, 2011

Compilation of few Words as Exchanged

Just a few minutes back, I wrote a Poem for which the catalyst was another post that I read. The post is written by a beautiful and sweet friend of mine. And she is the one who writes few words here and there to act as catalyst for my brain to generate the thoughts and give shape to the poems that I have been posting off recently.  And let me give her Due Credit for being the Source of Inspiration for me.

There had been few exchanges that we often have with each other and they can be well collated as one nice Lyrics.  Here I am putting them up for the wider Audience to enjoy the creativity -
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कि पंक्तियाँ कुछ यूँ लिखी हैं की रोक नहीं पाओगे
कुछ यूँ लिखी है की बंद किताब सी पढ़ नहीं पाओगे

सुनना चाहेंगे हम कुछ आपकी ही जुबां से
कि नाम आँखों से हम यूँ ही नहीं पढ़ पाएंगे

जुबां हमारी से क्या सुनिएगा ऐ हुज़ूर
ये तो सिर्फ आरज़ू बयां करती हैं
ध्यान इस बात का कीजिएगा
कि ये तो सिर्फ हया अर्ज करती हैं

जुबां से वही कहिये ऐ शब्दों के मालिक
वो शब्द जो ये दिल-ऐ-नादाँ समझना चाहे
कि हम यूँ शब्दों को नहीं सुनते ऐ जानिब
हम तो धडकनों की आहट सुन लिया करते हैं

धड़कने हमारी आह पर भी हाल-ऐ दिल बयां नहीं करती
ऐ राहगुजर ये फकीर का दिल है किसी शायर की कलम नहीं

दिल फकीर का हो या शायर का, ज़ज्बात तो दोनों में होते हैं
कुछ जुबां से कहें कुछ आँखों से, कि कुछ दिल में छुपाए बैठे हैं

शायर का दिल तो ज़ज्बातों से मौसिकी को राह दिखता है
और दिल फकीर का खुदा की इबादत में डूबा जाता है
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I hope this compilation would make a good creative reading...signing out with the hope to hear from all who read it....

खुशी - खुदा की नेमत

खुशी ना ढूंढ तू अपनी किसी तमन्ना में
कि दर्द ही मिलता है इस गली जाने से
ना कर तू रोशनाई को इस कदर परेशाँ
कि हो जाए स्याह ये खून तेरे जिगर का
खुशी ढूंढनी है गर तुझे कहीं ऐ बंदे
तो जा तू खुदा के घर उसकी इबादत में
खुशी गर तुझे मिलनी है कहीं ऐ बंदे
तो जा तो उस परवरदिगार के आलम में
ना ढूंढ खुशी किसी और के दमन में
कि छुपी है ये तेरे अपने ही आँगन में
उठ, जाग और बढ़ा अपने कदम
कर इबादत खुदा की, पा उसकी नेमत

Tuesday, May 17, 2011

आशियाँ

तिनका तिनका जोड़ आशियाँ यूँ सजाना
ना हो कोई रुसवा न रहे कोई कहीं तन्हा
ख्वाबों को भी कुछ इस कदर सजाना
की आँखों की राह ना टूटे दिल का अफसाना 

ऐ राहगुजर, राहगीर में ना ढूंढ हमसफ़र
कि राह से यूँ  बेगार बेवजह ना गुजर
जीना मरना तो इस कायनात का खेल है
इसे तू अपनी आह से ना जोड़ राहगुजर
तिनका तिनका जोड़ आशियाँ यूँ सजाना
कि हर राहगुजर तेरे ही आशियाँ को ताके
तिनका तिनका जोड़ आशियाँ यूँ सजाना
ना हो कोई रुसवा न रहे कोई कहीं तन्हा

Saturday, April 30, 2011

बेपरवाह

यादें गर खामोश कर जाती तो न होता ये दिल बेचैन
ना होते रूबरू इस कदर गम-ऐ-जिंदगी से
शामों तन्हाई ना करती इस कदर गुफ्तगूं
ना  होती जिंदगी में गहरी ज़ुत्सजु

वादे उनके यूँ बेसब्र ना कर जाते
गर बातों में उनकी शान-ऐ-वफ़ा ना होती
बातें उनकी जो आती है याद तुम्हें
साबित  कर जाती हैं ईमान उनका

कुछ थे वो मजबूर, कुछ थी उनकी मजबूरी
ना थे झूठे उनके वादे, ना थी खोखली उनकी बातें
कुछ गर ना कह गए होते वो तुमसे

यूँ खामोश ना होती तुम्हारी तन्हाई

शायद सुन न सके तुम कहीं उस दिल कि धडकन
ना सुन सके तुम उनके होठों कि थिरकन
दिल में जो उनके कसक उठी
वही यादें तुम्हें खामोश तन्हाई दे बैठी

उठ ऐ राहगुजर पहचान अक्स अपना जिंदगी के आईने में
संभाल अपने दिल को जिसमें है उठा यादों का सैलाब
ठहर, संभल और कर ध्यान उस खुदा का
जिंदगी में हर मोड पर जिसने तेरा साथ दिया

Thursday, April 28, 2011

मौसम-ऐ-जज़्बात

मौसम  तो है वही पुराना लौट आई पुरवाई भी
ना जाने क्यूँ लगता है की हो तन्हाई और वो नहीं
सोचने पर हम मजबूर हुए, पूछा हमने खुदा से भी
समझ न सके ये दुरियाँ, यादों के साये में भी

इन्तहा लगती ये आरज़ू-ऐ-इश्क की है
कि आरज़ू की है ये जूत्सजू 
ये दिल डूबा किन गहरे जज्बातों में
कि दिल से गहरे जज़्बात हैं क्या

जुबां पे यूँ उतर दर्द सा है हैं शब्द भी कुछ सर्द से ही
आज  पुराना मौसम लौटा, लौट आई पुरवाई भी
मन में मेरे यूँ हलचल हुई, आँखें भी पथराई सी
हुआ कुछ एहसास यूँ की हो तन्हाई और वो नहीं

Sunday, March 6, 2011

आँखें


कि हया शर्म लाज लज्जा है तो इन आँखों में
पर कहीं गहराई में छुपी है किसी कि खामोशी
दुनिया को दिखती है सिर्फ इनकी मासूमियत
कि छिपी है कहीं इनमें कोई सच्चाई
है तो कुछ गहराई इन आँखों में
कि दिल का दर्द इनमें सिमट आता है
कुछ तो है इन आँखों में
कि होठों कि मुस्कान तक दबा जाता है

काफिर

कौन कमबख्त कहता है तुझे काफिर
गर बात मेरी करते हो ऐ जानिब
तो जानो कि मैंने खुदाई को रुसवा किया है 
अक्स पे मैंने खून-ऐ-रोशनाई से ज़िक्र किया है
कि इबादत हम खुदा की क्या करें 
जब खुदा ने ही ज़ख्म बेमिसाल दिया है
कि आलम कुछ इस क़द्र है बेसब्र खुदा का
ना वो मुझे जन्नत ना जहन्नुम दे सकता है
कौन कमबख्त कहता है तुझे काफिर
कि हश्र मेरा देख, मुझे तो दोज़ख नसीब ना हुआ

Saturday, February 26, 2011

जिंदगी अक्स में गर गुजरती

गर अपने होंठो पर सजाना है तो खुदा कि इबादत को सजा
गर कुछ गुनगुनाना है तो जिंदगी के नगमें गुनगुना
कि ये सफर नहीं किसी सिफार कि कगार का
जानिब ये है अक्स तेरी ही शक्शियत का
जिंदगी का मानिब समझ ऐ राहगुज़र
कि राह में थक कर मंजीलें नहीं मिलती
समझ बस इतना लीजे ऐ खुदा के बंदे
कि यादों में तो गैर बसा करते हैं
जा तू अपनों के दिल में बसर कर
जिंदगी का मानिब समझ ऐ राहगुज़र
कि गुनगुनाना है कुछ तो जिंदगी के नगमें गुनगुना
गर अपने होंठो पर सजाना है तो खुदा कि इबादत को सजा

Wednesday, November 3, 2010

दास्तान आंसुओं की

आंसुओं की दास्ताँ न पूछ मुझसे
कि आंसू तो यूँही निकल पड़ते हैं
थामना भी चाहूँ इन्हें
मगर तेरी याद में बह निकलते हैं