Showing posts with label view - Hindi. Show all posts
Showing posts with label view - Hindi. Show all posts

Thursday, June 14, 2012

तड़प तड़प कर - एक विशेष गाना

कुछ गाने होते हैं जो आपके जेहन में एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं| ऐसा ही एक गाना है फिल्म "हम दिल दे चुके सनम से" गाने के बोल कुछ इस तरह के हैं -

बेजान दिल को तेरे इश्क ने जिंदा किया
फिर तेरे इश्क ने ही इस दिल को तबाह किया

गाने में एक तड़प है, मोहब्बत में धोखा खाए एक दिल का दर्द है|  कितना सही लिखा है इसमें और कितना दर्द है इस गाने में कि खुद सलमान खान जितनी बार इस गाने को सुनते थे सेट्स पर और आज भी, उनकी आँखों में आँसूं आ जाते हैं|

इस गाने की शुरुआत जितनी दर्द भरी है, इसके अंतरे में भी उतनी ही तड़प है -

अगर मिले खुदा तो पूछुंगा खुदाया
जिस्म देके मिटटी का, शीशे का दिल क्यूँ बनाया
और उसपे दे दिया फितरत के यह करता है मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी कुदरत......

कभी कभी सोचता हूँ तो इस गाने के बोल महबूब साहब ने जब लिखे होंगे तो उन्हें जेहन में क्या चल रहा होगा?  कितनी तड़प होगी उनके दिल में कि उन्होंने इतने दर्द भरे बोल लिखे?

और इस गाने के लिए  इस्माइल-दरबार की जोड़ी ने भी क्या सही संगीत दिया है, उसकी भी दाद देनी पड़ेगी|  गाने के बोल अगर गाने की जान हैं तो उसका संगीत उस गाने का शरीर हैं| और उस गाने की धडकन है है उसके गायक KK की आवाज़|

कुछ भी हो इस गाने को मेरे ख्याल से हर संगीत प्रेमी पसंद करता होगा|

मेरी कोशिश है कि काश कभी मैं इस गाने के जैसा कुछ लिखूं| यह मेरी ख्वाहिश रहेगी या नहीं यह तो वक़्त का ही फरमान होगा|

शायद एक दिन......दिल की उस आग से मेरा भी सामना होगा कि मैं ऐसा गाना लिखूं.......शायद किसी की कहानी में इतना दर्द हो कि मैं भी उसमें डूब कर ऐसे कुछ बोल लिखूं.....

Monday, January 23, 2012

चीत्कार - एक कल्पना

विगत दिवसों में कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए जिन्होंने मेरी अंतरात्मा को झंझोड कर रख दिया|  मैं एक पिता से मिला, यद्यपि उनका एक नाम भी है, किन्तु मेरे विचार में उनका नाम यहाँ उल्लेखित करना उचित नहीं होगा| एक पिता के रूप में मैंने उनको पहली बार देखा था; हालाँकि मैं उन्हें बरसों से जानता हूँ, किन्तु ऐसा पहली बार हुआ कि मैंने उनका पित्रत्वरूप देखा| बात यहीं समाप्त नहीं हुई, उनके पितृत्वरूप में मैंने उनके करुण, द्वेष एवं रोद्राव्तार देखे|

करुण भाव उनका अपनी उस बेटी के लिए, जिसे वो गोद में खेला न सके| उनका अपना वो अंश जिसका बचपन वो देख ना सके| एक पिता जिसे भाग्यविधाता ने पिता तो बनाया पर उसके भाग्य में बेटी का पित्रप्रेम नहीं लिखा|  अगर इसमें करुण भाव नहीं है तो क्या है?  उनके करुण रूप को मैंने अपनी कुछ पंक्तियों में इस प्रकार प्रदर्शित किया है -


भूत देखता हूँ जब मैं अपना
कहीं कुछ कमी सी लगती है
पाल पोस जिसे बड़ा करना था
उसके बचपन के कमी सी लगती है
नन्हे नन्हे उन क़दमों में
बाल थाप की कमी सी लगती है
एक पिता की गोद में
बिटिया की कमी सी लगती है
असमंजस में हूँ आज मैं
कि क्या तुझको खोज पाउँगा
तेरी पालकी न सही तो क्या
तेरी डोली को कांधा दे पाउँगा||
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------

उनका द्वेष एवं रोद्र भाव मैंने उनके अपनी भूतपूर्व अर्धांगिनी के लिए देखे जो उनकी बेटी की माँ हैं| आज वो साथ क्यों नहीं हैं, उनके उस नासूर को तो मैंने छेड़ा नहीं, किन्तु द्वेष क्यों है ये मैं भली भांती समझ गया| उनका द्वेष है कि उस महिला ने उन्हें उनकी अपनी बिटिया से दूर रखा, उन्हें अपनी बिटिया के बचपन से दूर रखा|  उनके इन भावों को मैं कुछ इस प्रकार वर्णित करता हूँ -

बहुत भाग्यशाली है तू
कि मेरी बिटिया की है तू माँ
यहाँ खड़ा मैं सोच रहा कि
बिटिया में ही अटके हैं तेरे प्राण
कसम ये खाता हूँ प्राण तेरे हर लूँगा
अपनी बेटी को मैं तुझसे दूर कर दूंगा
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------

उनके इस स्वरुप को देख कर मुझे अचम्भा तो हुआ, कितु उससे अधिक मुझे ग्लानी हुई, कि जिस नारी को हम अनेको-अनेक रूप में पूजते हैं वो आज इस प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित कर रही है| उस महिला से अधिक मुझे उसके मात-पिता की शिक्षा पर क्षोभ हो रहा है जो अपनी बेटी की गलतियों का ढांक उसके दुर्व्यवहार को बढ़ावा दे रहे हैं||

Friday, June 17, 2011

एक रिश्ता - पिता और बेटे का

अपने घर और परिवार से दूर आज निखिल अपने अतीत के बारे में सोच रहा था| सोच रहा था अपने बचपन के बारे में, जब उसकी हर इच्छा उसके पिता उसके कहते ही पूरी करते थे| सोच रहा था उन दिनों के बारे में जब उसके पिता उसके लिए हर समय कुछ न कुछ करने के लिए तत्पर रहते थे| हालाँकि निखिल जानता है कि आज भी उसके पिता उसके लिए कुछ भी कर जाएंगे| किन्तु निखिल आज भी अपने पिता से डरता है, डरता है कि न जाने कब और कि बात पर वो नाराज़ हो जाएँ|

निखिल का किस्सा तो मात्र एक किस्सा है| जहाँ तक मेरा अपना मानना है, इस विश्व में अधिकतर बाप-बेटे का रिश्ता निखिल और उसके पिता जैसा ही है|  पिता हालाँकि अपने बेटे को सबसे ज्यादा चाहता है, किन्तु उसके पैर गलत दिशा में न बढे ये सोच कर अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करता| बेटा भी हालाँकि जानता है कि पिता उसे माँ से ज्यादा लाड करते हैं, लेकिन अव्यक्त भावनाओं को देखते हुए वो हर समय डरा और सहमा रहता है| ये नहीं जानता कि किस बात पे पिता नाराज़ हो जाएंगे, और किस समय उनके बीच बातों का तांता थम जाएगा|

ये बात आज तक मैं खुद नहीं समझ सका कि बाप और बेटे का रिश्ता इतनी कच्ची डोर से क्यों बंधा होता है? क्यों बाप अपने बेटे के लिए अपने प्यार को अपने गुस्से से प्रकट करता है और क्यों एक बेटा अपने पिता के लए अपनी भावनाओं को अपने डर में छिपाए रखता है|  मेरा सोचना है कि एक उम्र के बाद पिता और बेटा अच्छे मित्र बन सकते हैं, किन्तु ऐसा होते हुए मैंने बहुत कम देखा है|  बेटे अधिकतर अपनी माँ से ज्यादा आसानी से बात कर लेते हैं, किन्तु कुछ भावनाएं वो उन्हें भी व्यक्त नहीं कर सकते|  कुछ भावनाएं ऐसी होती हैं जो एक बेटा अपने पिता कि गोद में सर रखकर या उनके सामने बैठ कर ही कह सकता है| लेकिन पिता कि गोद से बेटा एक बार बचपन का झूला झूलकर जो उतरता है, तो जीवन में उसे वो गोद दुबारा नहीं मिलती|  ऐसा क्यों है?

ऐसा क्यों है कि पिता के प्यार में बेटे तो उनका गुस्सा ही दिखाई देता है? ऐसा क्यूँ है कि बेटा अपने पिता से अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर सकता? ऐसा क्यूँ है कि पिता सीक बेटा हमेशा डरा और सहमा रहता है?