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Tuesday, March 9, 2010

तिरंगे कि कहानी

काफी दिनों से मन में गुबार था
तिरंगे की कहानी का अम्बार था
कि सोचा बहुत कैसे कहूँ
लेकिन दर्द ऐसा है कब तक सहूँ

हुआ कुछ यूँ कि तिरंगा मिला सपने में
कहानी थी उसकी इतनी सर्द
ना थी उसमें हद्द
अब कैसे सहूँ में ये दर्द

तिरंगा खुश होता गर
उसे शहीद पर चढ़ाया जाए
उसे लाल किले कि प्राचीर पर फहराया जाए
उसे आजादी का परचम बनाया जाए

तिरंगा दुखी है क्योंकि
उसे भ्रष्ट नेताओं पर लहराया जाता है
उसे गुंडे बदमाशों कि गाडी पर पाया जाता है
उसे सरे आम बेईज्ज़त किया जाता है

कहना है तिरंगे का कुछ यूँ
कि उसे हर घर पर लहराना है
उसे हमारे दिलों में बस जाना है
उसे जात पात से परे जाना है

चाह है उसकी उस पुष्प सी
कि उस पथ पर दें उसको फहरा
मातृभूमि की सेवा में
जिस पथ चले वीर अनेक
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आखिरी कुछ पंक्तियाँ श्री माखनलाल चतुर्वेदी कि कविता - "पुष्प की अभिलाषा" से प्रेरित हैं|

Monday, March 8, 2010

मर्द का दर्द

एक फिल्म बनी थी "मर्द" जिसमें अमिताभ बच्चन साहब ने कहा था मर्द को दर्द नहीं होता| किन्तु आज के माहोल में जब हम नज़र उठा कर अपने चारों और देखते हैं तो ये एहसास होता है कि मर्द को ही दर्द होता है| आप ये सोचेंगे कि कैसे?? तो सोचिये कि आज के इस ज़माने में हम International Womans' Day मानते हैं, Man's Day नहीं :))

आज हम बात करते हैं स्त्रियों को काबिल बनाने कि, किन्तु कभी ये सोचा है कि वे खुद कितनी काबिलियत रखती हैं?

मैं आज के दौर में आदमी / मर्द के दर्द को कुछ इस तरह व्यक्त करूँगा -

बेचारा मर्द क्या करे इस ज़माने में
गर औरत पर हाथ उठाए तो जालिम
गर पिट जाए तो बुजदिल
गर औरत को गैर के साथ देख कर लड़े तो शक्की
गर देख कर भी चुप रह जाए तो बे-गैरत
गर घर से बहार रहे तो आवारा
गर घर में बैठे तो नाकारा
बच्चों को डांटे मारे तो ज़ालिम
न डाटें तो लापरवाह
गर औरत को नौकरी से रोके तो झक्की
गर औरत को नौकरी करने दे तो जोरू का गुलाम
अरे आखिर ये करे तो क्या करे
हालात यूँ कहिये कि दर्द है पर बयां नहीं कर सकता
गर बयां कर दे तो मर्द नहीं रह सकता

:))