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Wednesday, June 29, 2011

नखराली

चहकती महकती सी आई वो
हलचल कर गयी जीवन में
चंचल मधुर स्वर में
मद्धम गीत गुनगुना गई

नखराली वो, मेरे  ह्रदय में
अपनी छवि छोड़ गई
अपनी चूडियों की खनक से
कानों में मधुरम संगीत छोड़ गई

ना समझ सके कब वो
अंतर्मन में समा गई
ना समझ सके कब वो
जीवन संगिनी बन गई

उसके बिना हम जी ना सकेंगे
कि अब बस यही अभिलाषा है
जीवन  के अन्धकार में
उसके गेसूओं में सो जाना है

Wednesday, June 15, 2011

अश्रुधारा

जब ह्रदय में हो पीड़ा
जब मन में हो घृणा
दिखे  हर और जब अंधियारा
बहती है नैनों से अश्रुधारा

नहीं हो काबू जब क्रोध पर
कठिन लगे जब राह हर
कठोर हो अपने जैसे है धरा
बहती है नैनो से अश्रुधारा

विचारों हो जब अतिक्रमण
करे जब मष्तिष्क अत्यधिक भ्रमण
ना दिखे जीवन में जोई और चारा
बहती है नैनो से अश्रुधारा

बहती बहुत है नैनो से अश्रुधारा
कि ना लगे जग न्यारा
ना लगे जीवन फिर प्यारा
ना रहे कोई दुलारा

अश्रुधारा को तुम रोक सकोगे
जीवन  को भी भोग सकोगे
अगर त्याग कर सको आशाएं
अगर दूर कर सको ये बाधाएं

Tuesday, May 17, 2011

घरोंदा

रे मनवा न सुन तू इस जग की
बना घरोंदा बुन इन तिनको को
नहीं व्यर्थ होगा परिश्रम तेरा
नहीं कोई इसमें समय का फेरा

प्रेम न तू अपने स्वप्न से कर
कि स्वप्न तो आते हैं अंधियारे में
रे  मनवा बना घरोंदा तू तिनकों से
और पा फल तू अपने परिश्रम से


भटक न होकर निराश हार से
कि पथरीला अत्यंत ये पथ तेरा
होना न निराश स्वप्ना बिखरने से
कि है बहुत संघर्ष इस जीवन में

ध्यान रख रे मनवा तू इस बात का
कि ना जग झूठा न स्वप्ना तेरा
रे मनवा बना घरोंदा अपना तिनको से
कि पथ से उठ पथ्थर उसका रखवाला बने

Sunday, March 6, 2011

आँखों की ये भाषा

शब्दों के मर्म को समझो यही किताबों की भाषा
आँखों के भाव को समझो यही उनकी अभिलाषा
जानना किसीको नहीं है इतना कठीन
चेहरा उनका सब बोलता है आँखों के अधीन
लिखता नहीं मैं यूँ ही ये पंक्तियाँ
इनमें ही में भाव व्यक्त करता
शब्दों को जो तुम पढते, समझो उनके मर्म को
आँखों में जो तुम देखते, समझो उनके कर्म को

Saturday, November 13, 2010

भूल ना पाती वो नाते

कुछ पंक्तियाँ यूँ लिखी किसी ने कि मन हुआ विचलित....
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कुछ नींदें कुछ स्वप्न चुरा कर जब तुमसे करती बातें,
सज जाती हैं बंद पलक पर, विगत दिनों की बरसातें,
बूँद - बूँद सिमटे जाते पल भीग-भीग कर गीला मन,
सुधियों की कैसी बदली जो, भूल ना पाती वो नाते ||
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पढ़ इन पंक्तियों को विचार कुछ उमड़े ह्रदय में| उठा कलम लिख दीं कुछ पंक्तियाँ हमने भी -

भूल ना पाती वो नाते, आखों में जो स्वप्न जगाते
अधरों पर सिमट सी जाती बरसात कि वो कोमल बूंदें
ह्रदय में यूँ सिमट जाते पल वो जो यूँ बीते
कुछ बीते तेरी बांहों कुछ बीते तेरी पलकों में

स्वप्न में जब तुम आती, मेरे ह्रदय में बस जाती
अपनी काली लंबी लटों से, घटाओं सा स्पर्ष कराती
भूल ना पाती वो नाते, आँखों में जो स्वप्न जगाते
कुछ नींदें कुछ स्वप्न चुरा कर हम तेरी यादों में खो जाते

Tuesday, March 9, 2010

तिरंगे कि कहानी

काफी दिनों से मन में गुबार था
तिरंगे की कहानी का अम्बार था
कि सोचा बहुत कैसे कहूँ
लेकिन दर्द ऐसा है कब तक सहूँ

हुआ कुछ यूँ कि तिरंगा मिला सपने में
कहानी थी उसकी इतनी सर्द
ना थी उसमें हद्द
अब कैसे सहूँ में ये दर्द

तिरंगा खुश होता गर
उसे शहीद पर चढ़ाया जाए
उसे लाल किले कि प्राचीर पर फहराया जाए
उसे आजादी का परचम बनाया जाए

तिरंगा दुखी है क्योंकि
उसे भ्रष्ट नेताओं पर लहराया जाता है
उसे गुंडे बदमाशों कि गाडी पर पाया जाता है
उसे सरे आम बेईज्ज़त किया जाता है

कहना है तिरंगे का कुछ यूँ
कि उसे हर घर पर लहराना है
उसे हमारे दिलों में बस जाना है
उसे जात पात से परे जाना है

चाह है उसकी उस पुष्प सी
कि उस पथ पर दें उसको फहरा
मातृभूमि की सेवा में
जिस पथ चले वीर अनेक
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आखिरी कुछ पंक्तियाँ श्री माखनलाल चतुर्वेदी कि कविता - "पुष्प की अभिलाषा" से प्रेरित हैं|

Sunday, March 7, 2010

वक़्त नहीं

आज के दौर में हर किसी को बहुत कुछ पाने कि चाह है और इस चाह में उन्हें अपनों का ध्यान नहीं, ना ही उनके पास वक़्त है अपनो के लिए| इस कविता में कवी ने उसे बड़े ही नायब तरीके से ज़ाहिर किया है| ये कविता किसने लिखी ये मुझे इल्म तो नहीं, लेकिन ये नायाब कविता में आपके लिए यहाँ लिख रहा हूँ| मुझे ये कविता किसी मित्र ने भेजी है....
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हर ख़ुशी है लोगों के दमन में
पर एक हंसी के लिए वक़्त नहीं .
दिन रात दौड़ती दुनिया में
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं

माँ कि लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं

सारे नाम मोबाइल में हैं
पर दोस्ती के लए वक़्त नहीं
गैरों कि क्या बात करें
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं

आँखों में है नींद बड़ी
पर सोने का वक़्त नहीं
दिल है ग़मों से भरा हुआ
पर रोने का भी वक़्त नहीं

पैसों कि दौड़ में ऐसे दौड़े
कि थकने का भी वक़्त नहीं
पराये एहसासों कि क्या कद्र करें
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं

तू ही बता ऐ ज़िन्दगी
इस ज़िन्दगी का क्या होगा
कि हर पल मरने वालों को
जीने के लिए भी वक़्त नहीं.......

Friday, November 27, 2009

शत शत नमन है उस वीर को - Tribute to the Heros of 26-11

शत शत नमन है उस वीर को
जीवन जिसने अपना बलिदान किया
मातृभूमि के सम्मान में
सर्वस्व अपना त्याग दिया
निडर निर्भीक हो कर
शत्रु पर उसने वार किया
विजय की और अग्रसर हो
इसी सोच का आलाप किया
शत शत नमन है उस वीर को
मातृभूमि की रक्षा में
जिसने जीवन का परित्याग किया
अभिनन्दन है उस वीर को
रक्त से अपने विजय तिलक
जिसने मातृभूमि को अर्पित किया

Wednesday, November 11, 2009

युद्ध का उदगार

प्रखर प्रभद्ध ललाट पर रक्तिम तिलक की छाप है
युद्ध को अग्रसर वीर अश्व पर सवार है
हाथ में लिए वो खडग, कृपाण, कटार है
नेत्रों के उसकी मातृभूमि का सम्मान है

मस्तक पर उसके रणविजय का प्रताप है
कालसर्प सी लहराती उसकी तलवार है
कटार पर उसकी विजय की धार है
बाजुओं में लिए विजय का प्रमाण है

धरा ने किया जो आज ये रक्तपान है
वीर के रण धर्म में उसका रूप विशाल है
काली के श्रृंगार में उसका योगदान है
प्रखर प्रभद्ध ललाट पर रक्तिम तिलक की छाप है

रक्तबीज रक्तपान युद्ध का कोहराम है
संस्कृति के चक्र में इसका एक स्थान है
मानव के ह्रदय का ये एक उदगार है
उन्नति के पथ पर ये एक अर्धविराम है

प्रखर प्रभद्ध ललाट पर रक्तिम तिलक की छाप है
युद्ध को अग्रसर वीर अश्व पर सवार है




Tuesday, November 10, 2009

वर्षा ऋतू में जीवन का श्रृंगार हुआ

वर्षा ऋतू में क्या कहें
जीवन में हुई हलचल है
काली इन घटाओं को देख
तुम्हारी घनी लटों का आभास हुआ
यूँ बूंदे जब गिरी वृक्षों पर
तुम्हारे आलिंगन का आभास हुआ
नाचते मयूर को देख
ये ह्रदय भी पागल हुआ
वृक्षों से गिर जब धरती में सिमटी बूँदें
मेरे अंतर्मन में तेरे ही नाम कि पुकार हुई
पानी जब पहुँचा धरातल में
सींचा हर जड़ को उसने
बीज जो दबे थे धरती के गर्भ में
उनमें भी उन्माद हुआ
अंकुर फिर पनपा उनमें
तो धरती का श्रृंगार हुआ
देखो तो इन कोपलों से
एक नए जीवन का आधार हुआ
क्या कहूँ मैं तुमसे प्रिये
कि वर्षा ऋतू में जीवन का श्रृंगार हुआ

Sunday, May 27, 2007

दिल की कलम से

कीसीं ने कभी सही कहा था...
की दीखता है मंजर असली
बजते हैं साज़ सारे...
जब छेड़ दो तार दिल के
नहीं मालुम क्यों....
तुमने आवाज़ दी ...
और हम रो दीये....
आन्सुयों की जगह कलम से
कागज़ पर ये
शब्द बीखेर दीये